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छठ पूजा : छठ पूजा कब, कैसे और क्यों मनाया जाता हैं ?

छठ पूजा क्यों मनाया जाता है ? छठ पूजा कैसे मनाया जाता है ? छठ पूजा भारत के कई राज्यों में मनाया जानेवाला का एक आस्था और विश्वास का महापर्व है।

मुख्य रूप से यह पर्व बिहार, झारखण्ड तथा उत्तरप्रदेश में मनाया जाता है किन्तु धीरे – धीरे यह महापर्व  प्रवासी लोगों द्वारा बिहार झारखण्ड तथा उत्तरप्रदेश के अलावा देश के कई हिस्सों में भी प्रचलित हो गया है।

नहाय खाय से लेकर उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देने तक चलने वाला यह महापर्व चार दिनों का होता है। छठ मे छठ गीत भी गाया जाता है।

छठ पूजा

छठ पूजा की शुरुआत कैसे हुई :

एतिहासिक कथाओं के अनुसार पूरानों में कई कहानियाँ मिलती है। अनेक कथाओं में एक कहानी यह भी है कि राजा प्रियवंत को कोई संतान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ  कराकर प्रियवंत की पत्नी मालिनी को यहुति के लिए बनाई गई खीर खिलाई जिसे उन्हें पूत्र की प्राप्ति हुई ।

लेकिन वह पुत्र मृत पैदा हुआ। राजा प्रियवंत मृत पुत्र को लेकर शमशान गये और पुत्र वियोग में अपना प्राण त्यागने लगे | उसी वक्त भगवान की मानस पूत्री देवसेना प्रकट हुई। देवसेना ने राजा से कहा कि तुम मेरी पूजा करो और दूसरों को भी करने के लिए प्रेरित करो।

देवसेना सृष्टि के मूल प्रवृत्ति के अंश में उत्पन्न हुई है इसी कारण वो षष्ठी कहलाती है। राजा प्रियवंत की पत्नी ने देवी पष्ठी मईया के कहे अनुसार षष्ठी व्रत की तो उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उसी दिन से लोग पुत्र प्राप्ति तथा सुख समृद्धि के लिए षष्ठी पर्व मनाते है।

 कौन हैं छठी मईया

कहा जाता है कि छठी मईया सूर्यदेव की बहन हैं। इनका जन्म सृष्टि के मूल प्रवृति के छठे अंश में उत्पन्न हुई है। इसी कारण वो षष्ठी कहलाती है। छठी मईया के पूजा करने से छठी मईया के साथ – साथ सूर्य देव भी प्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।

छठ पूजा कैसे मनाते है

चार दिवसीय चलने वाला यह महापर्व है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्लपक्ष चतुर्थी को ही शुरू हो जाता है

पहला दिन (नहाय खाय):

पहला दिन नहाय खाय होता है। सबसे पहले व्रती घर की साफ-सफाई कर गंगा स्नान अथवा नदी तालाब में जिसको जहां जैसी सुविधा हो नहाते है। इसके बाद शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन बनाते हैं। भोजन में अरवा चावल, रोटी, चनादाल तथा लौकी की सब्जी बनाने कि परम्परा है। व्रती भोजन में  सेंधा नमक और शुद्ध घी का प्रयोग करते हैं। सबसे पहले व्रती भोजन करते हैं। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्य भी इस भोजन को ग्रहण करते हैं।

 दुसरा दिन (खरना)

दुसरा दिन खरना के रूप में मनाया जाता है। जिसमें व्रती दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को चावल और शुद्ध दुध, गुड़ का खीर बनाया जाता है। कई जगहों पर पीठा और रोटी बनाने कि भी परमपरा है। इसके साथ ही खरना गीत भी गाया जाता है।

व्रती शाम को पितल के पात्र (थाली) और मिट्टी के ढकनी में जिसे कोशी भी बोला जाता है उसमें सजाकर घर के पवित्र स्थान में बैठकर सूर्य भगवान की पूजा कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। परिवार तथा अन्य लोगों को फिर प्रसाद दिया जाता है।

तिसरा दिन (संध्या अर्ध्य ) :

तीसरे दिन संध्या अर्ध्य के रूप में मनाया जाता है। जिसमें व्रती या घर के अन्य सदस्य ठेकुआ शुद्ध गेहूँ के आटे का घी में बनाते है। अरवा चावल का कसार भी बनाया जाता है। प्रसाद पितल के बरतन में बनाया जाता है। प्रसाद के लिए नारियल अरत, पियरी, फूल, चना, पान कसैली, अच्छत, जाफर तथा विभिन्न प्रकार का फल को सूप में सजाया जाता है।

सूप बांस के अथवा पितल का भी रहता है। सूप को सजाकर व्रती नया कपड़ा पहनकर अपने परिवार के तथा आसपास के लोगों  के साथ नदी अथवा पोखर तालाब में जाते हैं। नदी में स्नान कर जल में ही खड़ा रहकर सूप को हांथ में उठाकर दूध से शाम को अर्ध्य दिया जाता है।

chhath puja

चौथा दिन (सुबह का अर्ध्य)

चौथा दिन व्रती शाम की तरह ही सुबह में सूर्योदय के पहले उसी जगह पर अपने परिवार वालों के साथ नदी या तालाब पर पहुंचते है। व्रती सुप और दउरा में शाम वाले प्रसाद को अलग रखकर नया प्रसाद यानि दूसरा प्रसाद सूप में सजातें है तब उस प्रसाद को लेकर नदी या तालाब पर जाते है। शाम की तरह ही सुबह में नदी में स्नान कर हांथ में सूप उठाकर उगते सूर्य को दूध या पानी से अर्ध्य दिया जाता है।

छठी मईया को प्रसाद भरा सूप अर्पण करते हैं। फिर नदी में दीप दान भी किया जाता है। व्रती अर्ध्य के बाद कच्चे दुध और प्रसाद खाकर अपना पारण कर छठ व्रत की समाप्ति करते हैं। सूप और दउरा के प्रसाद को परिवार के सदस्यों और आसपास के लोग जो घाट पर साथ में जाते हैं उन्हें बाट दिया जाता है।

इसी तरह हम छठ मईया का पर्व आस्था और विश्वास के साथ मनाते हैं जिससे सूर्य भगवान प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

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